Friday, December 12, 2008

सज़ा कबूल की हमने...

जब ज़िन्दगी समझ मे आयी
तो ज़िन्दगी से दूर थे हम
मरना चाहा पर जीने के मजबूर थे हम
हर सज़ा कबूल की हमने, सर झुकाकर
कसूर इतना था के बेकसुर थे थम..

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